नई आर्थिक नीतियों के तहत विशाल पैमाने पर विश्व पटल पर फैली अनियमितताओं एवं लापरवाही जैसी अनेक विसंगतियों के कारण आई मंदी की मार से अनेक घर बर्बादी के कगार पर पहले ही पहुंच चुके है। इस परिवेश में उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के तहत विश्व बैंक से निकाली गई अरबों-खरबों की राशि कार्य कर रहे करोड़ों लोगों को स्वेैच्छिक सेवा निवृत्ति के माध्यम से बेकार करने हेतु बांटकर, एन. जी. ओ. के बीच लुटाकर एवं अनाप सनाप मार्ग में अपव्यय कर जो संचित धन के साथ अनियमितताएं बरती गई , उसी का यह परिणाम है कि आज पूरे विश्व स्तर पर मंदी का दौर दिखाई दे रहा है।हमारा देश इस तरह के परिवेश से अछूता तो रहा नहीं, साथ ही सस्ती लोकप्रियता बटोरने हेतु कर्ज माफ कर जो संचित धन का दुरुपयोग किया है ,उसी का परिणाम आज हम सभी मंदी के रुप में भुगत रहे है।यदि विश्व बैंक से ली गई उधार राशि को स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति के वजाय उद्योग विकास में लगाया गया होता तो आज इस देश का विकास के पैमाने पर नया ही नक्शा होता तथा मंदी की मार के प्रतिकूल प्रभाव से बचाव भी हो जाता।
इधर मंदी की मार से आम जनजीवन परेशान तो है ही, दिन पर दिन बढती जा रही मंहगाई की तेज धार के आगे वह बेकरार होता जा रहा है।यहां की सरकार अपने संवाद में एक तरफ तो मंदी के प्रभाव को देश के भीतर नगण्य बता रही है तो दूसरी ओर इसके बचाव में छटनी के बजाय कटौती किये जाने का मार्ग सुझा रही है। इस तरह के दोहरे मापदंड से देश के भीतर आमजन की समस्याएं घटने के बजाय बढ़ चली है। सरकार के आकडें में मंहगाई का स्वरुप भी कुछ इसी तरह के दोहरे मापदंड के बीच घिरा दिखाई दे रहा है जहां मंहगाई की दर सरकारी आकडें में पहले से काफी कम दिखाई दे तो रही है पर वास्तविकता में बाजार में जहां यहां का आम उपभोक्ता खड़ा है वहां का नजारा ठीक इसके विपरीत देखा जा सकता है। आज मंहगाई दर 13 फीसदी से घटकर 3.35 के आस - पास पहुंच तो चुकी है परन्तु बाजार में दैनिक प्रयोग के सामान पहले से कहीं ज्यादा भाव में धड़ल्ले से बिक रहे है तथा सरकार मंहगाई दर कम होने की वकालत कर रही है। इस दिशा में बाजार के भाव को देखा जा सकता है जहां चीनी, दाल, आटा, चावल, तेल, मसाला, प्याज आदि पहले से ज्यादा दाम में बिक रहे है ं। आज के बाजार भाव का उस माह के बाजार भाव से तुलनात्मक अध्यन किया जा सकता है जब मंहगाई दर सर्वाधिक रही है।
लोकसभा चुनाव नजदीक आते देख केन्द्र सरकार आम जन को लुभाने की दृष्टि से मंदी की मार से बचने की दिशा में राहत दिये जाने की अनेक घाेंषणाएं तो दिन पर दिन करती जा रही है परन्तु इसका कहीं भी सकरात्मक प्रभाव नजर नहीं दिखार्इ्र दे रहा है । आज भी यहां कार्य कर रहे अनेक लोगों को ऐनकेन प्रकारेण मंदी के नाम निकाला जा रहा है और सरकार मंदी से बचाव का मार्ग तलाश रही है। यह सरकार की आमजन के प्रति कैसी प्रतिबध्दता है विचार किया जाना चाहिए। जहां सरकार द्वारा मंदी के इस दौर में छंटनी किये जाने के वजाय कटौती किये जाने का सुझाव देना आज शोषण के नये स्वरुप को उजागर कर दिया हैे। सरकार की इस तरह की घोषणा होते ही निजी कंपनियों में प्रत्यक्ष / अप्रत्यक्ष रुप से वेतन कटौती का सिलसिला शुरु हो गया है साथ ही अपने को सुरक्षित समझने वाले सार्वजनिक क्षेत्रों के लोग भी कहीं कहीं इस तरह के परिवेश के शिकार हो चले है। सरकार अपने बचाव में भले ही जो भी तथ्य जारी करे , इसके दोहरेपन रवैये के कारण सारे तथ्य झूठे पड़ते जा रहे है।
देश की अधिकांश जनता मध्यमवर्गीय है। जो रोजगार पर टिकी है। रोजगार नहीं मिलने या छीन जाने पर उसकी मनोदशा कैसी हो सकती है, सहज अनुमान लगाया जा सकता है। मंदी के इस दौर में मंदी के नाम हो रहे शोषण से बचाव किये जाने की अपेक्षाएं उसे सरकार से है ं। सरकार का भी दायित्व होता है कि संकट के दौरान उसकी रक्षा करे जिसके हित के निमित्त उसका स्वरुप परिलक्षित होता है। मंदी पूंजीवादी व्यवस्था से उपजी नई आर्थिक नीति की देन है जिसका शिकार यहां का हर मध्यमवर्गीय परिवार हो रहा है। मंदी एवं मंहगाई आज दोनों ही भारत जैसे विकसित देश के लिये घातक है। इस तरह के परिवेश से निजात पाने का मार्ग प्रशस्त आमजन द्वारा गठित सरकार को ही करना होगा तभी उसका स्वरुप साकार हो सकेगा।
देश में लोकसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है। चुनाव घोषणा के साथ ही आचार संहिता भी लागू हो गई है। मंदी एवं मंहगाई दोनों से यहां के आमजन आज परेशान है, जिसका लोकसभा चुनाव पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। देश के सभी राजनैतिक दल इस चुनाव में सर्वाधिक सीट पाकर केन्द्र की सत्ता पर कब्जा करने की प्रक्रिया में जुट गये हैं। मंदी की मार एवं मंहगाई की तेज धार के बीच खड़ी देश की आम जनता का ही निण्र्ाय नई लोकसभा के स्वरुप को निर्धारित करेगा।
Thursday, March 19, 2009
Tuesday, December 16, 2008
आर्थिक मंदी की छाया से बदलती कॉपर की काया
एशिया का सबसे बड़े ताम्र उद्योग हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड पर भी विश्व में छायी आर्थिक मंदी की छाया नजर आने लगी है। जहां यह उद्योग विगत घाटे की सीमा को पार करते हुए लाभांश की ओर बढ़ते कदम के बल पर मिनी रत्न से अभी हाल में ही नवाजा गया है। वहीं आज विश्व बाजार में कॉपर के लगातार गिरते जा रहे मूल्य को लेकर भावी भविष्य के प्रति चिंतित दिखने लगा है। इस तरह के हालात में आयातित सांद्रित कॉपर अयस्क से तांबा निकाला जाना कॉफी महंगा पड़ रहा है। इस उद्योग के तहत झारखंड राज्य की घाटशिला यूनिट इंडियन कॉपर कॉम्प्लैक्स, छत्तीसगढ़ राज्य की मलाजखण्ड कॉपर प्रोजेक्ट एवं राजस्थान प्रदेश की खेतड़ी कॉपर कॉम्प्लैक्स एवं कोलिहान कॉपर माइन्स फिलहाल कार्यरत है। इसी उद्योग का महाराष्ट्र तालोजा कॉपर प्रोजेक्ट भी चालू हालत में है, जहां कॉपर छड़ का उत्पादन होता है। मंदी के दौर से गुजरते उद्योग को बचाने के लिए फिलहाल उच्च प्रबंधक वर्ग ने आयातित सांद्रित अयस्क को मंगाने का कार्यक्रम रोक कर खेतड़ी कॉपर कॉम्प्लैक्स के स्मेल्टर एवं परिशोधन संयंत्र को अल्प अवधि के लिए बंद रखे जाने का कार्यक्रम बनाया है। जहां फिलहाल स्मेल्टर प्लांट को बंद कर दिया गया है एवं कुछ दिन उपरान्त परिशोधन संयंत्र को भी बंद हो जाने की स्थिति झलक रही है। इन जगहों पर कार्यरत ठेका मजदूरों को तत्काल कार्य से मुक्ति दे दी गई है जिसके वजह से इस वर्ग में उदासी एवं बेचैनी से झलक साफ-साफ देखी जा सकती है। खेतड़ी खदान में संचालित एम.इ.सी.एल. ने भी अपने अस्थायी कर्मचारियों को एक महीने का नोटिस देकर कार्यमुक्ति का पत्र थमा दिया है। जिससे मजदूर वर्ग में काफी असंतोष फैला हुआ है। इस तरह के परिवेश के साथ-साथ अस्थायी रूप से कार्यरत श्रमिक वर्ग में असुरक्षित भविष्य को लेकर चिंता घिर आयी है जहां प्रबंधक वर्ग की ओर से 20 प्रतिशत की कटौती पर स्वैच्छिक रूप से अल्प अवधि अवकाश पर जाने की खबर असंतोष का कारण बनी हुई है। अफवाहों का बाजार भी यहां गर्म देखा जा सकता है। जहां भविष्य को लेकर तरह-तरह की बातें हो रही हैं। प्रबंधक वर्ग की ओर से जहां मंदी के दौर से उद्योग को बचाने की दिशा में इस तरह के कदम को सकारात्मक बताया जा रहा है। वहीं इस तरह के परिवेश में असुरक्षित भविष्य की उभरती छाया से यहां कार्यरत श्रमिक वर्ग में उभरते अशांत भाव को आसानी से देखा जा सकता है। एक तरफ आयातित सांद्रित कॉपर अयस्क को बंद कर दिया गया है तो दूसरी ओर यहां तैयार सांद्रित कॉपर अयस्क को इस उद्योग की दूसरी इकाई झारखंड राज्य में स्थित इंडियन कॉपर कॉम्प्लैक्स को भेजे जाने का क्रम जारी है जहां ट्रांसपोर्ट पर आने वाला अनावश्यक खर्च का भार इस मंदी के दौर में कंपनी पर पड़ता साफ-साफ दिखाई दे रहा है। इस तरह के उभरते परिवेश इस उद्योग को मंदी के दौर से बचाने के कौनसे तरीके का स्वरूप परिलक्षित कर पा रहे हैं, जहां स्मेल्टर प्लांट को बंद कर तैयार सांद्रित अयस्क को दूसरे युनिट भेजा जा रहा है, विचारणीय मुद्दा है। इस तरह के परिवेश पर भी यहां चर्चा का दौर जारी तो है परंतु विरोध के उभरते स्वर कहीं भी दिखाई नहीं दे रहे हैं। इस तरह के हालात में यहां तैयार सांद्रित अयस्क को इकट्ठा कर स्मेल्टर प्लांट को पुन: शीघ्र चालू करने की योजना बनाई जानी चाहिए। इस तरह की भी यहां आम चर्चा तो है परन्तु श्रमिक वर्ग को प्रतिनिधित्व करने वाले सभी संगठन इस दिशा में मौन दिखाई दे रहे हैं।
जहां तक कॉपर अयस्क के भौगोलिक परिवेश की वास्तविकता का प्रश्न है, खेतड़ी कॉपर कॉम्प्लैक्स से जुड़ी शेखावाटी क्षेत्र का बनवास व सिंघाना क्षेत्र अभी भी इस दिशा में अव्वल है। जहां हजारों वर्ष तक अच्छे ग्रेड में तांबा निकाले जाने हेतु 1.8 प्रतिशत का कॉपर अयस्क भूगर्भ में विराजमान है। इस क्षेत्र में बनवास खदान की चर्चा तो कई बार चली। पूर्व में नये सॉफ्ट लगाने हेतु उद्धाटन भी हुआ। खदान को नये सिरे से चालू कर इस क्षेत्र से कॉपर अयस्क निकाले जाने की योजना भी बनी परंतु सभी योजनाएं कागज तक ही सिमट कर गई है। 'सदियों से गड़ा शिलान्यास का पत्थर/बन गया वहीं अब रास्ते का पत्थर। फाइलों के पर अब झरने लगे हैं/रास्ते में अभी बहुत से दफ्तर॥'
वर्तमान हालात में इस उद्योग को सही रूप से मंदी के दौर से बचाने के लिए किसी भी यूनिट को बंद करने के बजाय चालू रखने की प्रक्रिया पर बल दिया जाना चाहिए। आयातित सांद्रित कॉपर अयस्क निश्चित तौर पर महंगा पड रहा होगा। इसे बंद करने का निर्णय तो उचित माना जा सकता है परन्तु यहां तैयार सांद्रित कॉपर अयस्क को बाहर भेजने का कोई औचित्य दिखाई नहीं देता। इसे इकट्ठा कर बंद पड़ी योजनाओं को शीघ्र से शीघ्र चालू करने का जामा पहनाया जाना चाहिए। इस उद्योग को चालू रखने के लिए बनवास क्षेत्र में नई खदान शीघ्र खोले जाने की महती आवश्यकता भी है। कोलिहान एवं खेतड़ी खदाने काफी पुरानी हो चुकी है जहां अयस्क निकालना भी काफी महंगा पड़ सकता है। इस तरह के हालात में बनवास क्षेत्र में नई खदान को शीघ्र चालू कर सिंघाना क्षेत्र तक फैले भूगर्भ के 50 मिलियन टन से भी ज्यादा कॉपर अयस्क को निकाल कर इस उद्योग को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। इस क्षेत्र के सांसद भी वर्तमान में केन्द्रीय खान मंत्री है। जिनसे काफी अपेक्षाएं है। इस उद्योग के अन्दर हो रहे अनावश्यक खर्च लापरवाही एवं चोरी जैसे अनुचित कार्यों पर प्रतिबंध लगाकर उद्योग को मंदी के दौर से बचाया जा सकता है।
बाजार भाव तो चढ़ते उतरते रहेंगे। इस उद्योग को अपने क्षेत्र में उपलब्ध कॉपर अयस्क को प्रचुर मात्रा में निकालकर स्वावलम्बी बनाये जाने की प्रक्रिया ही इसे बचा सकती है एवं विपरीत परिस्थितियों से मुकाबला करने की ताकत पैदा कर सकती है। कुशल प्रबंधन, संरक्षण, आत्मविश्वास एवं अयस्क के क्षेत्र में स्वावलंबन के सिध्दान्त ही इस उद्योग की गरिमा को बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए लगातार लाभांश की ओर इसके कदम बढा सकेंगे। इंतजार है कि यह उद्योग भी स्वावलंबी बनकर अन्य उद्योगों की भांति मिनी रत्न से नवरत्न की श्रेणी में अपने आपको खड़ा कर सके। इस दिशा में सभी के सकारात्मक सोच एवं कदम की महती आवश्यकता है जो आर्थिक मंदी की छाया से कॉपर की बदलती काया को बेहतर स्वरूप दे सकती है।
जहां तक कॉपर अयस्क के भौगोलिक परिवेश की वास्तविकता का प्रश्न है, खेतड़ी कॉपर कॉम्प्लैक्स से जुड़ी शेखावाटी क्षेत्र का बनवास व सिंघाना क्षेत्र अभी भी इस दिशा में अव्वल है। जहां हजारों वर्ष तक अच्छे ग्रेड में तांबा निकाले जाने हेतु 1.8 प्रतिशत का कॉपर अयस्क भूगर्भ में विराजमान है। इस क्षेत्र में बनवास खदान की चर्चा तो कई बार चली। पूर्व में नये सॉफ्ट लगाने हेतु उद्धाटन भी हुआ। खदान को नये सिरे से चालू कर इस क्षेत्र से कॉपर अयस्क निकाले जाने की योजना भी बनी परंतु सभी योजनाएं कागज तक ही सिमट कर गई है। 'सदियों से गड़ा शिलान्यास का पत्थर/बन गया वहीं अब रास्ते का पत्थर। फाइलों के पर अब झरने लगे हैं/रास्ते में अभी बहुत से दफ्तर॥'
वर्तमान हालात में इस उद्योग को सही रूप से मंदी के दौर से बचाने के लिए किसी भी यूनिट को बंद करने के बजाय चालू रखने की प्रक्रिया पर बल दिया जाना चाहिए। आयातित सांद्रित कॉपर अयस्क निश्चित तौर पर महंगा पड रहा होगा। इसे बंद करने का निर्णय तो उचित माना जा सकता है परन्तु यहां तैयार सांद्रित कॉपर अयस्क को बाहर भेजने का कोई औचित्य दिखाई नहीं देता। इसे इकट्ठा कर बंद पड़ी योजनाओं को शीघ्र से शीघ्र चालू करने का जामा पहनाया जाना चाहिए। इस उद्योग को चालू रखने के लिए बनवास क्षेत्र में नई खदान शीघ्र खोले जाने की महती आवश्यकता भी है। कोलिहान एवं खेतड़ी खदाने काफी पुरानी हो चुकी है जहां अयस्क निकालना भी काफी महंगा पड़ सकता है। इस तरह के हालात में बनवास क्षेत्र में नई खदान को शीघ्र चालू कर सिंघाना क्षेत्र तक फैले भूगर्भ के 50 मिलियन टन से भी ज्यादा कॉपर अयस्क को निकाल कर इस उद्योग को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। इस क्षेत्र के सांसद भी वर्तमान में केन्द्रीय खान मंत्री है। जिनसे काफी अपेक्षाएं है। इस उद्योग के अन्दर हो रहे अनावश्यक खर्च लापरवाही एवं चोरी जैसे अनुचित कार्यों पर प्रतिबंध लगाकर उद्योग को मंदी के दौर से बचाया जा सकता है।
बाजार भाव तो चढ़ते उतरते रहेंगे। इस उद्योग को अपने क्षेत्र में उपलब्ध कॉपर अयस्क को प्रचुर मात्रा में निकालकर स्वावलम्बी बनाये जाने की प्रक्रिया ही इसे बचा सकती है एवं विपरीत परिस्थितियों से मुकाबला करने की ताकत पैदा कर सकती है। कुशल प्रबंधन, संरक्षण, आत्मविश्वास एवं अयस्क के क्षेत्र में स्वावलंबन के सिध्दान्त ही इस उद्योग की गरिमा को बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए लगातार लाभांश की ओर इसके कदम बढा सकेंगे। इंतजार है कि यह उद्योग भी स्वावलंबी बनकर अन्य उद्योगों की भांति मिनी रत्न से नवरत्न की श्रेणी में अपने आपको खड़ा कर सके। इस दिशा में सभी के सकारात्मक सोच एवं कदम की महती आवश्यकता है जो आर्थिक मंदी की छाया से कॉपर की बदलती काया को बेहतर स्वरूप दे सकती है।
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